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कैसे पाकिस्तान को कंट्रोल करती है वहां की आर्मी, इमरान खान कितने कमजोर कितने ताकतवर हैं वहां - The Task News

पाकिस्तान में इमरान ख़ान पर ये आरोप लगता रहा है कि वो जनता के चुने हुए प्रधानमंत्री नहीं हैं, बल्कि उन्हें पाकिस्तान की आर्मी ने चुना है. सच्चाई भी यही है, क्योंकि पाकिस्तान में सेना ही सरकार है और आर्मी चीफ़ उस सरकार के सरदार होते हैं। वहां सरकार नाम की चिड़िया को कब पिंजड़े में बंद करना है और कब उड़ने देना है, ये पाकिस्तान की आर्मी ही तय करती है। पाक आर्मी ने पहले इमरान खान को उड़ने दिया और जब वो हद से ज़्यादा उड़ते दिखे, तो जनरल क़मर जावेद बाजवा ने उनके पर कतर कर फड़फड़ाने के लिए छोड़ दिया. पाकिस्तान में हुकूमत का ताज सेना के गलियारों से होकर ही गुजरता है. दुनिया के सामने बेपर्दा इस हक़ीक़त को इमरान ख़ान ने क्रिकेटर रहते ही सबक की तरह याद कर लिया था। जब सत्ता मिली तो कुछ महीने बाद तक वो सेना के लिए एक ही तराना गुनगुनाते थे- जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे। लेकिन विपक्षी दलों ने इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ जब मोर्चा खोला, तो उनको भी अंदाज़ा था कि सत्ता बचाने के लिए वो पाकिस्तानी सेना का दरवाज़ा ही खटखटाएँगे। सेना को इमरान से दूर रखने की रणनीति के तहत विपक्षी दलों ने पहले ही शोर मचाना शुरू कर दिया था। विपक्ष की ये रणनीति काम कर गई। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव आने के बाद इमरान ख़ान ने जनरल बाजवा से मुलाकात की और उसी के बाद इमरान ख़ान की पार्टी में खुली बग़ावत हो गई। जिसका एक ही मतलब था कि इमरान अब पाकिस्तान आर्मी के किसी काम के नहीं रहे। पाकिस्तान में 2018 के चुनाव से ठीक पहले नवाज़ शरीफ़ को ज़िंदगी भर के लिए अयोग्य घोषित किया जा चुका था और शरीफ़ खुलेआम आरोप लगा रहे थे कि ये जनरल बाजवा की साज़िश है, ताकि इमरान के सत्ता में आने का रास्ता साफ़ हो सके। जनरल बाजवा बदनामी का कड़वा घूंट पी गए, लेकिन इमरान ख़ान ने उनके सामने नंबर बढ़ाने के लिए जो कांड किया, उसे पाकिस्तान का इतिहास कभी नहीं भूल सकता। नवंबर 2019 में जनरल बाजवा रिटायर होने वाले थे और इमरान ख़ान ने उनको तीन साल का एक्सटेंशन देने का ऑर्डर जारी कर दिया। लेकिन एक्सटेंशन का मामला बाजवा और इमरान, दोनों के गले की हड्डी बन गया। विपक्षी दलों ने बाजवा के एक्सटेंशन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने आर्मी चीफ़ का कार्यकाल बढ़ाने को अवैध बता दिया। पाकिस्तान के इतिहास में ये पहला मौका था, जब आर्मी चीफ़ की खुलेआम भद्द पिटी। इज्ज़त बचानी थी, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को रद्द करने के लिए इमरान खान की सरकार ने संसद में क़ानून पास कराया और जनरल बाजवा का कार्यकाल तीन साल के लिए बढ़ा दिया। इमरान ख़ान को लगा था कि जनरल बाजवा पर एहसान करके उन्होंने बहुत बड़ा तीर मारा है और अब वो पाकिस्तान की सेना के भी बॉस बन जाएंगे। इसी मुग़ालते में उन्होंने अक्टूबर 2021 में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI के डायरेक्टर जनरल पद पर नदीम अहमद अंजुम की नियुक्ति पर रोक लगा दी। ये नियुक्ति जनरल बाजवा ने की थी। इमरान खान को बुरा लगा, क्योंकि बाजवा ने उनसे पूछना तक ज़रूरी नहीं समझा था। उसी के बाद जनरल बाजवा ने इमरान को उनकी हैसियत बताई। पाकिस्तान में तख़्तापलट के आसार दिखे, तो इमरान के होश ठिकाने आए और पूरी सरकार सफ़ाई देने में जुट गई कि पाक आर्मी के साथ कोई विवाद नहीं है। ISI चीफ़ की नियुक्ति पर इमरान सरकार और जनरल बाजवा के बीच जो नौटंकी हुई, उसके बाद पाक आर्मी को समझ में आ गया कि इमरान पर दांव लगाना अब ख़तरनाक है. क्योंकि पाकिस्तान की सेना को परदे के पीछे से कठपुतली सरकार चलाने की आदत है और इमरान स्मार्ट बनने की सनक में पहले ही पाक आर्मी को कई बार बेनकाब कर चुके थे। साल 2020 में 18-19 अक्टूबर की रात कराची के होटेल में मरियम नवाज़ के पति मोहम्मद सफ़दर की गिरफ़्तारी का विवाद भी इमरान के अनाड़ीपन की मिसाल थी। गिरफ़्तारी के लिए पाकिस्तानी रेंजर्स को भेजा गया, जो पाकिस्तान की आर्मी के मातहत काम करती है। गिरफ्तारी का आदेश कराची के एसपी को बंधक बनाकर जारी कराया गया, जिसके बाद पाकिस्तान में पुलिस और सेना आमने-सामने थी। इस घटना के बाद पाकिस्तान की सेना इमरान खान की राजनीति के कीचड़ में पूरी तरह सनी हुई नज़र आने लगी। पाकिस्तान में पहले सेना ने इमरान ख़ान का इस्तेमाल किया और इमरान ख़ान ने सेना का। सेना की सोहबत में ही इमरान ख़ान ने सीखा कि सत्ता के लिए संबंधों को सीढ़ी बनाने से भी नहीं हिचकना चाहिए। उन्होंने अपनी शादी तक को सीढ़ी बनाया और उसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए उन्हें भ्रम हो गया कि वो पाक सेना के सिर पर भी सवार हो सकते हैं। यही भ्रम उन्हें ले डूबा।

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