BCCI में खिलाड़ियों के साथ किस तरह की होती है राजनीति - The Task News

बीसीसीआई विश्व का सबसे ताकतवर क्रिकेट बोर्ड माना जाता है पर बीसीसीआई में पॉलिटिक्स हमेशा ही चर्चा का विषय रही है, सीनियर खिलाड़ियों को उनकी धीमी फील्डिंग के कारण टीम से आराम देने से लेकर विश्वकप में  बिना किसी रिकॉर्ड के नए खिलाड़ियों को टीम में लाना हो जबकि आपके एक्सपीरियंस खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी टीम के बाहर रहें।
खेल से जुड़े इस पॉलिटिक्स के कारण कई खिलाड़ियों के करियर खत्म हो गए, चाहे फिर वो इरफान पठान हों, गौतम गंभीर हों या फिर अंबाती रायुडू। क्रिकेट में पॉलिटिक्स कोई नई बात नही है, पहले भी बीसीसीआई में अंतरंग पॉलिटिक्स के कई मामले सामने आ चुके हैं। उनमें से एक बड़ा मामला तब सामने आया जब 2008 में पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ जैसे बड़े खिलाड़ियों को यह कहकर भारतीय टीम से बाहर कर दिया कि वह अच्छे फील्डर्स नहीं हैं। धोनी के इस फैसले से फैंस काफी नाराज़ हुए थे, हालांकि इसी फैसले के बाद धोनी की कप्तानी में भारतीय टीम ने 2011 विश्वकप जीता। 2019 विश्वकप में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब सिलेक्शन कमेटी ने अंबाती रायुडू की जगह विजय शंकर का चुनाव शिखर धवन के रिप्लेसमेंट के रूप में किया। सेलेक्टर्स ने विजय शंकर को एक 3D खिलाड़ी बताते हुए यह बयान दिया की “शंकर एक बेहतर ऑल राउंड खिलाड़ी हैं उस कंडीशन में”। विश्वकप से पहले अंबाती रायुडू को भारतीय टीम में नंबर 4 के खिलाड़ी के रूप में प्रबल दावेदार माना जा रहा था। 2018 और 2019 के आईपीएल में रायुडू का प्रदर्शन सराहनीय रहा और 2018 में चेन्नई सुपर किंग्स को आईपीएल ट्रॉफी जिताने में रायुडू का प्रमुख योगदान रहा। सेलेक्टर्स के इस फैसले के परिणाम स्वरूप भारतीय टीम की बल्लेबाजी न्यूजीलैंड के खिलाफ सेमीफाइनल में लड़खड़ा गई और  टीम को हार का सामना करना पड़ा। भारतीय सेलेक्टर्स के इस निर्णय के बाद अंबाती रायुडू काफी हताश हो गए और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से सन्यास ले लिया।
भारतीय दिग्गज सुनील गावस्कर ने भी बीसीसीआई पर पॉलिटिक्स और पक्षपात का आरोप लगाया, जब 2020 में बीसीसीआई ने भारतीय कप्तान विराट कोहली को ऑस्ट्रेलिया दौरे से पेटरनिटी लीव के लिए मंजूरी दी जबकि कुछ समय पहले ही भारतीय तेज गेंदबाज टी नटराजन की पेटरनिटी लीव की अर्जी को बीसीसीआई ने नकार दिया था। पूर्व में भी बीसीसीआई एक बार भारतीय स्पिनर रविचंद्र अश्विन की पेटरनिटी लीव की अर्जी को नकार चुकी है। गावस्कर ने बीसीसीआई पर “दोहरे मापदंड” का भी आरोप लगाया। खिलाड़ियों के चयन और इसे ही कुछ फैसलों के कारण बीसीसीआई को अक्सर फैंस और मीडिया की आलोचना का सामना करना पड़ता है। लेकिन यह बात भी सच है की बीसीसीआई अपने चुने हुए खिलाड़ियों को पूरी तरह से सपोर्ट करता है और उन्हें बेहतर खिलाड़ी बनाए के लिए हर सक्षम प्रयास करता है।